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त्राहि त्राहि मची है सुनलो पुकार

त्राहि त्राहि मची है सुनलो पुकार,
अन्नदाता जख्मी सुन लो कहार!!
राजनीति की चासनी में लिपटा खंजर,
खंजर के खेल में हो जायें न बंजर!!
70साल की सत्ता यह है असाय जख्म,
आज बनके विपक्ष कुरेद रहे हो जख्म!!
हितकर बनाते नियम आज न देखते सच,
मृत्यु के आगोश में न सोते अन्नदाता!!
क्यों इतना पिछङ गये? सोते र गयें,
आँखो के आँसू भी सूखा दरिया र गयें!!
ग़ुलामी और आज़ादी में अंतर क्या?
जड़ ही सूख रहा वृक्ष का होगा क्या?
अन्नदाता तब भी अन्न का था मोहताज,
आज आज़ादी में भी क्यों है मोहताज!!
कर्ज़ का प्रलोभन मकडजाल है बना,
तब साहूकार आज सरकार है बना!!
अन्न का दाम नहीं मूल धन भी न मिला,
खलियान पर टेडी दृष्टि कर्ज़ तले दवा!!
सरकार के कर्ज़ की नीति आत्मदाह ,
कुडकी छिनी छत कैसा क्या जीवन!!
सोचों कहाँ कौन है ?है खलनायक,
फसलो की उपज का भुगतान कहाँ?
ओने पोने दामो में बेचकर मूल्यधन कहाँ?
फसलो सव्जी का मूल्य हो निर्धारित ,
हर साल निर्धारित में हो इजाफा !!
साथ चलने के लिए एक वार देना मोका,
वो वक्त आज है इसको है भुनाना!!
कैसे हो समाधान उपाय है खोजना,
कर्मचारियो को एक माह का वेतन !!
किसान के हित के लिए ख़ज़ाना भरना,
पूर्ण रूप से चुकता करो कर्ज़ कर्जदाता!!
एकवार कर्मचारी तुम भी तो एहसास करो,
बिन पगार के माह गुजरना हैं मुश्किल!!
सोचो तीन माह के बाद आती है फसल,
कुदरत हुआ मेहरवान तो आती हैं फसल!
कुदरत की भेट चङ जाती पकती फसल,
मूल्य ने अपना दिखाया रंग कहाँ है दाम!
आज सङको पर बिछ रही फसलो की चादर,
बह रही नदियाँ दूध की सडको पर!!
हाहाकार हाहाकार अन्नदाता बेहाल ,
मर्ज़ का करो ठोस अब ऐसा उपाय!!
हिन्दुस्तान के दो कंधे हो गये वेहाल,
वक्त रहते कर दो इनका उपचार!!
सरहद पर जवान और जमीं पर किसान,
सभलने का दिया है मौका करने को उपाय!
ज़ख़्म पर मरहम न लगाया तो बन जायें शूल,
आज कुछ किसान गोली का हुऐ है शिकार!!
जवान किसान मिल जायें तो हिन्दुस्तान बदल डालें,
सत्ता उनकी चाकरी उनकी जनता हो जायें गुलाम!!
अन्न भी उनका शस्त्र भी उनके पास,
शासन न हो जायें उनके हाथो में ये दूर नहीं!!
राजनीति अन्नदाता के कंधे रख न सेको रोटियाँ,
ये जनता है जब ठनक गई तब राजनीति बदल गई!!
जिस जिसने सेकी रोटिया उनकी बदल गई पार्टियाँ,
अन्नदाता बन दंगे लाटियाँ चलवाते हो,
पर मुखौटा कहाँ जनता किसान से छुपा पाते हो!!
राजनीति का घुसपेठिया अन्नदाता बन बैठा,
सभल जाओ कही इस बार नाम ही न मिट जायें!!
काम तो कुछ नेक करो ऐसे दंगे लाटियाँ न चलाओ,
अन्नदाता है ज़ख़्म को योही नासूर न बनाओ!!
- आकाँक्षा जादौन
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